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विशेष :आपदाएं और हम

✍️ हितेन्द्र शर्मा | March 28, 2020 04:44 PM

शिमला,

करें कोई और भरे कोई जी हां इससे ज्यादा कोरोना की परिभाषा समझ नहीं आ रहीं, आपदाओं का आना-जाना संपूर्ण विश्व समुदाय के लिए नया नहीं है। लेकिन आपदाओं के समय में आम जनमानस, प्रशासन, मीडिया और सरकारों को विवेकशील एंव मर्यादित होना चाहिए। वर्तमान में हमारे आचरण से हमारा वास्तविक चरित्र भी सामने आ रहा है। जानलेवा वायरस के गंभीर वर्तमान दौर में सुबह 7 बजे से दोपहर 1 बजे तक बाजारों का समय, शराब को मनुष्य जीवन के लिए महत्वपूर्ण घोषित करना, कुकरमुतों की तरह अनगिनत की संख्या में रिपोर्टिंग कर रहे लोगों का जमावड़ा, क्या आपदा की इस घड़ी में देश के साथ मजाक नहीं हैं?

मानवनिर्मित आपदाओं के इस दौर में लाकडाऊन से प्रदूषण का स्तर निरन्तर कम होता जा रहा है। प्रकृति चहुंओर खुशहाल नजर आ रही है, जैसे युगों बाद उन्मुक्त गगन में श्वास भरी हो। कल्पना कीजिए यदि 21 दिनों तक प्रकृति को प्रदूषण मुक्त भारत हम सौंपने का प्रण लेते है तो प्रकृति रोग प्रतिरोधक क्षमता से भरपूर, वनस्पति एंव औषधियों के गुणों वाला वातावरण हमें लौटाकर एक रोगमुक्त एंव खुशहाल भारत देश की नींव रखेगी। मानव द्वारा पेड़ और पहाड़ को काटना, भूमि खनन, नहर-नदी को प्रदूषित करना, हरी-भरी धरती को कंक्रीट के जंगलों में बदलना यदि कभी प्राकृतिक आपदाओं ने अपना प्रकोप दिखाया तो स्मरण रहे कि सेनेटाईजर, मास्क और क्वारंटाइन भी शब्दों तक सीमित रह जाएंगे।

मानवाधिकार जैसे अनेकों शब्दों के जाल में उलझकर हम स्वयं ही अमानवीय व्यवहार करते हैं। चारों दिशाओं में हवा, पानी, मिट्टी को प्रदूषित कर, निजी स्वार्थों के चलते प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाले लोग सम्पूर्ण मानवजाति पर कलंक है, ऐसे लोगों की तुलना जानवरों से भी नहीं की जा सकती, क्योंकि जानवर भी प्रकृति के संरक्षक है। प्रकृति के दुश्मनों को आप क्या कहेंगे, क्या ऐसे लोगों के भी मानवाधिकार हो सकते हैं?

सर्वप्रथम मानव बने, अधिकारों से पहले मर्यादा में रहकर कर्तव्यों का निर्वहन करें। देशभक्ति, देवभक्ति, धर्म और संस्कारों का राग अलापने से पहले अपने-अपने गांव, मोहल्ले, नगर के विषय में जानकारियां प्राप्त करें और उन्हें समझने के लिए निरन्तर प्रयासरत रहना चाहिए। हमें अपने घर-गांव से कितना प्रेम एंव लगाव है यह रोजमर्रा के हमारे व्यवहार से ही स्पष्ट हो जाता है। खुशहाल गाँव और समृद्ध शहर की कल्पना से हम भारत को एक विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित किया जा सकता हैं।

वर्तमान में आत्म सुधार ही देश की सबसे बड़ी सेवा हैं। आत्मकल्याण के लिए बुरे स्वभाव एंव बुरे कर्मों से बचना होगा। हमें बड़ी-बड़ी बातों के मायाजाल से निकल कर छोटी-छोटी बातों का महत्व समझते हुए अपने घर-गांव के चहुंमुखी उत्थान के लिए निरंतर संघर्षरत रहना होगा। मुँह उठाकर संचार के माध्यमों से देश के मंत्रियों को गालियाँ देना सिर्फ मानसिक दिवालियापन है। गांव और समाज के हित के लिए पंचायतों, नगरपालिकाओं और विधायकों से समक्ष अपनी आवाज़ बुलन्द करनी चाहिए। लेकिन समाजिक ताने-बाने में उलझकर, व्यक्तिगत डर और चाटुकारिता के कारण स्थानीय पंचों, प्रधानों, संबंधित प्रशासन और विधायक को छोड़ सभी राष्ट्रीय राजनीति को कोसते है, जोकि बेहद दुर्भाग्यपूर्ण एंव तथाकथित बुद्धिजीवियों के गैरजिम्मेदाराना व्यवहार का जीवंत प्रमाण है।

 

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