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कविता

दिनकर

प्रीति शर्मा असीम | September 23, 2020 08:21 PM
 
 
साहित्य जगत के "अनल" कवि का,
धैर्य जब चक्रवात पाता है ।
 
तब "दिनकर "भी "दिनकर" से, 
दीप्तिमान हो जाता है ।
 
"ओज" कवि "रश्मिरथी "पर, 
जब-जब हुंकार लगाता है ।
 
"आत्मा की आंखें "
कैसे ना खुलेगी ।
पत्थर भी पानी हो जाता है।
 
 साहित्य 
जगत के "अनल "कवि का।
 
"भारतीय संस्कृति के चार अध्याय" रच कर ,
भारत का विश्व में नाम किया।
 
"कुरुक्षेत्र "रच कर। 
आधुनिक गीता का निर्माण किया ।
 
"शुद्ध कविता की खोज" में निकला ।
"उजली आग का स्वाद" चखा।
 
 रेणुका ,उर्वशी ,रसवंती ,
यशोधरा का द्वंद गीत लिखा ।
 
सपना देख के 
"सूरज के विवाह" का ।
"हारे को हरी नाम "भज कर। 
अंतिम इतिहास रचा ।
 
कैसे भूल सकता ।
साहित्य दिनकर को ,
उसने जो इतिहास रचा।
 
 "अर्धनारीश्वर "की सार्थकता को, 
  साहित्य वन में छोड़ चला ।
 
साहित्य भूला नहीं सकता ।
ज्ञान ,पदमभूषण ,
भूदेव के अधिकारी को ।
 
सिमरिया की माटी को ,
उस "दिनकर "
काव्य अवतारी को।
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